घटना के समय दशा, गोचर व भिन्नाष्टक वर्ग के बिंदु

घटना के समय दशा, गोचर व भिन्नाष्टक वर्ग के बिंदु  

संजय बुद्धिराजा
व्यूस : 8330 | जुलाई 2015

प्रस्तुत उदाहरण में हमने जातक राजीव भाटिया के जीवन में घटित शुभ व अषुभ दोनों तरह की घटनाओं को अध्ययन हेतु प्रस्तुत किया है और यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि शुभ घटनाओं के घटने के समय घटना के कारक ग्रह या प्रत्यंतरदषा नाथ अपने-अपने भिन्नाष्टक वर्ग में अधिक बिंदुओं 4 या अधिक के साथ गोचरस्थ थे और अषुभ घटनाओं के समय कम बिंदुओं 4 या कम के साथ। इसके अतिरिक्त गोचरस्थ ग्रहों के भिन्नाष्टक वर्गों में कुल बिंदुओं का योग शुभ घटना के समय 28 या अधिक व अषुभ घटना के समय 28 से कम था।

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यहां अष्टकवर्ग की गणना हेतु पराषरी पद्ध ति का उपयोग किया गया है। राजीव भाटिया 29.04.1946, 01ः01, कानपुर जातक की मकर लग्न की कुंडली में तीसरे भाव में बुध व चंद्र, चतुर्थ में सूर्य, पंचम में राहु व शुक्र, छठे में शनि, सप्तम में मंगल, नवम में गुरू व एकादष में केतु स्थित है। जातक के पिता की मृत्यु 1 मई 1972 को हुई। उसका विवाह 10 दिसंबर 1975 को हुआ व पुत्र की प्राप्ति 22 मई 1977 को हुई। 10 मई 1998 को जातक की कार दुर्घटना हुई लेकिन उसका अपना बचाव हो गया। जातक के जीवन में घटित ये दो घटनायें शुभ हैं और दो अषुभ। आईये इन घटनाओं को प्रस्तुत शोध की दृष्टि से परखते हैं।

1. पिता की मृत्यु: 1 मई 1972 को जातक के पिता की मृत्यु के समय जातक की बुध/राहु/चंद्र की दषा चल रही थी। महादषानाथ बुध नवमेष होकर पिता से संबंधित घटना की ओर इषारा करता है। अंतर्दषानाथ राहु है जो कि पिता के कारक ग्रह सूर्य का परम शत्रु है। राहु पंचम भाव में शुक्र के साथ स्थित है जो कि पिता के भाव नवम भाव से द्वितीयेष यानि मारकेष है। प्रत्यंतर्दषानाथ चंद्रमा तृतीय भाव में है जो कि नवम भाव से सप्तम अर्थात मारक भाव है। चंद्रमा के साथ बुध है जो कि जन्म कुंडली का सप्तमेष यानि मारकेष है। अर्थात दषा काल पिता के लिये बहुत ही अषुभ चल रहा था। आईये अब गोचर भी देख लेते हैं। गुरू द्वादष भाव में वक्री होकर गोचर कर रहे थे जहां से उनकी दृष्टि चतुर्थ भाव अर्थात पिता के नवम भाव से अष्टम भाव पर पड़ रही थी। शनि का गोचर पंचम भाव से था जहां से उनकी तीसरी दृष्टि चतुर्थेष या नवम से अष्टमेष मंगल पर पड़ रही थी। अब यदि गोचर के दोनों बड़े ग्रह पिता के मृत्यु स्थान चतुर्थ भाव व उसके स्वामी ग्रह मंगल को क्रियाषील करेंगे तो पिता की मृत्यु का योग तो बन सकता है। 01.05.1972 को भिन्नाष्टक वर्गों में बिंदु सूर्य चंद्र मंगल बुध गुरू शुक्र शनि कुल 4 3 5 4 5 2 3 26 अब बारी है भिन्नाष्टक वर्ग के बिंदुओं को देखने की। भिन्नाष्टक वर्गों में गोचर कर रहे सभी सातों ग्रहों का अपने-अपने वर्ग में कुल बिंदुओं का योग 26 था यानि 28 से कम। प्रत्यंतर्दषानाथ चंद्र 3 बिंदुओं, नवमेष बुध 4 बिंदुओं व मृत्यु का कारक शनि 3 बिंदुआंे से गोचर कर रहे थे अर्थात ये तीनों ग्रह 4 या कम बिंदुओं से गोचर कर रहे थे। स्पष्ट है कि पिता से संबंधित अषुभ घटना की ओर इषारा करते हैं।

2. विवाह: 10 दिसंबर 1975 को जातक के विवाह के समय बुध/षनि/षुक्र की दषा चल रही थी। महादषानाथ बुध जन्मकुंडली में विवाह भाव यानि सप्तम भाव के स्वामी चंद्रमा से युति कर रहा है। शनि अंतर्दषानाथ है जो लग्नेष होकर शैया-सुख के भाव द्वादष भाव को दृष्टि दे रहा है। प्रत्यंतर्दषानाथ शुक्र है जो कि विवाह का ही कारक है। स्पष्ट है कि दषा क्रम विवाह देने में पूर्णरूप से सक्षम है। गोचर पर दृष्टि डालें तो शनि कर्क राषि में ही सप्तम भाव से गोचर कर लग्न पर भी प्रभाव डाल रहा था। गुरू का गोचर मीन राषि पर यानि सप्तमेष चंद्र पर से था जहां से वह सप्तम भाव को भी प्रभावित कर रहा था। अतः गोचर भी विवाह के अनुकूल था। विवाह के दिन गोचर के सभी ग्रह अपने अपने भिन्नाष्टक वर्गों में कुल 29 बिंदुओं अर्थात 28 से 10.12.1975 को भिन्नाष्टक वर्गों में बिंदु सूर्य चंद्र मंगल बुध गुरू शुक्र शनि कुल 4 4 2 3 6 6 4 29 अधिक बिंदुओं के साथ थे। सप्तमेष चंद्र 4 बिंदुओं के साथ तथा विवाह का कारक ग्रह शुक्र 6 बिंदुओं के साथ गोचरस्थ था अर्थात ये दोनों ग्रह 4 या अधिक बिंदुओं के साथ गोचर कर रहे थे। तो साफ हो गया कि शुभ घटना ही घटेगी यानि विवाह बिना किसी बाधा के हो जायेगा।

3. पुत्र का जन्म: 22 मई 1977 को जातक के पुत्र के जन्म के समय बुध/षनि/ गुरू की दषा चल रही थी। महादषा का स्वामी बुध ग्रह चंद्र कुंडली में पंचमेष चंद्रमा के साथ बैठा है और लग्न कुंडली में भी पंचम से पंचम भाव का स्वामी है। अंतर्दषा का स्वामी शनि लग्नेष होने के साथ-साथ द्वितीयेष यानि कुटुंब वृद्धि कारक है। प्रत्यंतर्दषा का स्वामी गुरू तो संतान का कारक ही है। अतः यह दषा क्रम संतान जन्म के अनुकूल था। गोचर का शनि कर्क राषि से भ्रमण कर रहा था अर्थात् चंद्र कुंडली के पंचम भाव से भ्रमण कर रहा था। गुरू का भ्रमण वृष राषि अर्थात् पंचम भाव और पंचमेष पर से ही था जो संतान जन्म का योग बना रहे हैं। 22.05.1977 को भिन्नाष्टक वर्गों में बिंदु सूर्य चंद्र मंगल बुध गुरू शुक्र शनि कुल 3 4 4 7 4 5 2 29 भिन्नाष्टक वर्गों में पुत्र जन्म के समय गोचर कर रहे ग्रहों के कुल बिंदुओं का योग 29 अर्थात 28 से अधिक था और संतान भाव के स्वामी पंचमेष शुक्र का गोचर 5 शुभ बिंदुओं से, पुत्र कारक गुरू का गोचर 4 बिंदुओं से था। अर्थात् दोनों ग्रहों का गोचर 4 या अधिक बिंदुओं से होने के कारण शुभ घटना यानि पुत्र का जन्म हुआ।

4. कार से दुर्धटना: 10 मई 1998 को जातक की कार से दुर्घटना के समय शुक्र/षनि/केतु की दषा चल रही थी। महादषानाथ शुक्र तो स्वयं ही वाहन कारक है। अंतर्दषानाथ शनि जन्मकुंडली के छठे भाव में स्थित होकर दुर्घटना का संकेत देता है। शुक्र व शनि का द्विद्र्वादष संबंध भी है। प्रत्यंतर्दषानाथ केतु की दृष्टि छठे दुर्घटना के भाव के स्वामी बुध पर है। अतः दुर्घटना का ही दषा क्रम चल रहा था। गोचर पर विचार करें तो पाते हैं कि शनि का गोचर मेष राषि पर से था जहां से वह छठे भाव को दृष्ट कर रहा है। गुरू का गोचर कुंभ राषि पर से था जहां से वह भी छठे भाव यानि दुर्घटना के भाव को दृष्ट कर रहा है। अर्थात् गोचर दुर्घटना का ही चल रहा था। 10.05.1998 को भिन्नाष्टक वर्गों में बिंदु सूर्य चंद्र मंगल बुध गुरू शुक्र शनि कुल 4 4 2 4 5 4 2 25 भिन्नाष्टक वर्ग की दृष्टि से देखें तो दुर्धटना के दिन गोचर के ग्रहों का भिन्नाष्टक वर्गों में बिंदुओं का कुल योग 25 यानि 28 से कम था और दुर्धटना के कारक मंगल के पास मात्र 2 बिंदु यानि 4 से कम थे। स्पष्ट है कि दुर्घटना के दिन का गोचर भिन्नाष्टक वर्ग के अनुसार अषुभ था जो दुघर्टना में तब्दील हो गया। इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि जीवन में घटित होने वाली प्रत्येक घटना का संबंध जन्म कुंडली के योगों, दषाओं व गोचर से तो होता ही है। इसके साथ-साथ गोचर करने वाले ग्रहों के उनके भिन्नाष्टक वर्गों में बिंदुओं से भी होता है। अधिक बिंदु शुभ घटना की ओर व कम बिंदु अषुभ घटना की ओर इषारा करते हैं।

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